जरा सी बात पे ना जाने वो कैसे नाराज़ हुए.
इतने दूर चले गए वो चाह के भी ना पा सके चाहे जितने खुमार हुए,
कुछ इस तरह से हमारी बर्बादी की सुरुआत हुई
दिन रात उनको देख के मुस्कुराया करते थे,
अब अब दिल मुस्कुराने को राजी नही उनके बिन दिन तो आज भी निकाल लेता हूं उनके बिन पर ज़िन्दगी भूल चुका हूं मैं कुछ इस तरह से हमारी तबाही की सुरुआत हुई,
वो जो ऊपरवाले ने दुनिया बनाई ना उसमे मेरी ज़िंदगी कुछ पलों के लिए आबाद हुई और बाकी बर्बाद हुई
जी हां कुछ इस तरह से हमारी बर्बादी की सुरुआत हुई,
ना जाने कैसे संभाले है खुद को ये उलझी हुई जान को
इतनी सी उम्र में उतनी बड़ी बात हुई
अब बताओ कैसी मेरी बर्बादी की सुरुआत रही ?
-दीप
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